अलीगढ़ कोरोना महामारी चलते अब हालात बद से बदतर हो जा रहे हैं. जहां अब लोगों के मरने के बाद शवों की बेकद्री भी होनी शुरू हो गई है. हालात ये हो गए है कि लोगों के शव ई-रिक्शा व आटो से पहुंच रहे हैं तो वही स्वास्थ्य विभाग मरीज के मरने पर मृतकों को एंबुलेंस तक मुहैया नहीं करा पा रहा है. तीमारदार अब अपनो के शवों को ई-रिक्शा व आटो में रखकर अंतिम संस्कार के लिए नुमाइश मैदान स्थित श्मशान गृह के मुक्ति धाम लेकर पहुंच रहे है, और एक लंबे इंतिजार के बाद शव का इसी शमशान घाट पर अंतिम संस्कार कर रहे हैं.

जहां ई-रिक्शा से शव को लेकर श्मशान घाट पहुंचे राहुल ने बताया कि 75 वर्षिय इनके बड़े पापा अमेंद कुमार गुप्ता की कल एक से दो बजे के बीच देर रात अचानक तबियत बिगड़ गई. उनकी हालत ज्यादा बिगड़ने पर घर के लोग उन्हें इलाज के लिए कोविड-19 जिला मलखान सिंह अस्पताल लेकर पहुंचे गए. जहा कोविड-19 जिला मलखान सिंह अस्पताल के किसी भी डॉक्टर ने बड़े पापा का उपचार करना तो दूर उनको देखने से ही मना कर दिया गया और उनकी अस्पताल में ही मौत हो गई.

जिसके बाद उनके शव को घर पहुंचाने के लिए जब अस्पताल में एम्बुलेंस वालों को भी फोन किया गया तो एम्बुलेंस वालों ने उनके शव लेकर जाने से मना कर दिया तो और भी कई जगह एम्बुलेंस के लिए कोशिश की गई. लेकिन सभी जगह से एम्बुलेंस के लिए मना कर देने पर शव को पड़ा देख परेशानी बढ़ गई.

अस्पताल के बाहर जहा बड़ी मुश्किलों से एक ई-रिक्शा दिखाई दिया. जिस ई-रिक्शा में अपने बड़े पापा का शव लादकर नुमाईश मैदान स्थित शमशान घाट पर अंतिम संस्कार करने के लिए पहुंचे. लेकिन यहां शमशान घाट में उनका अंतिम संस्कार करने के लिए पहले खुशामद की गई. लेकिन जब कई घंटों के लंबे इंतजार के बाद शमशान घाट में रखे शव का अंतिम संस्कार नहीं हो सका. तब शव का अंतिम संस्कार नही होने पर चीखना-चिल्लाने के बाद चार से पांच घंटे के बाद बड़ी मुश्किल से शव का नंबर आया और उसके बाद उनके शव का अंतिम संस्कार हो सका.

ई-रिक्शा में बॉडी रखकर लाना मजबूरी थी. जब शव को कोई एम्बुलेंस वाला लाने को ही तैयार नहीं हुआ और कोई गाड़ी वाला अपनी गाड़ी में बॉडी को ला नही सकता था तो क्या करते. चार पहिया की गाड़ी थी नही हम लोगों के पास तो क्या करते जब एम्बुलेंस ही नहीं मिली तो मजबूरी और हालात के चलते ई-रिक्शा से ही शव लादकर शमशान घाट ला सकते थे जो हालात के सामने हम लोगों की मजबूरी थी.