यह तस्वीरे उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ के एक छोटे से गांव बिधा की गढ़ी की है जहा इस गांव की छोटी सी उम्र की एक 13 वर्षीय खिलाड़ी की भूख केवल रोटी से नहीं मिटती उसको अपनी इस छोटी सी उम्र में कुछ बड़ा करने का जज्बा है जो अपने अंदर छुपे इस जज्बे से कुछ कर गुजरने के साथ उसको बड़े पदक भी चाहिए. जिन पदक को हासिल करने के लिए वो दिन रात ग्राउंड पर कड़ी मेहनत कर अपने जिस्म का पशीना बहाकर इन पदक को पाने के लिए वो मेंहनत कर अभ्यास करती है. भाग दौड़ भरी इस जिंदगी की दौड़ में पदक को पाने के लिए एक 13 वर्षीय शिवानी अपने हाथों में दरांती लेकर हर रोज खेतों में फसल काटने में अपनी मां के साथ खेतो में कई-कई घंटे काम कर उनका हाथ बटाती है,

जिसके बाद खो-खो व कबड्‍़डी जैसे खेल के गुर सीखने के लिए अपने घर से साइकिल पर सवार होकर हर दिन कई किलोमीटर दूर तहसील खैर इलाके के कस्बा जट्टारी में अपने कोच दलबीर सिंह बालियान के साथ ग्राउंड में प्रैक्टिस करने के लिए जाती है. वही 13 वर्षिय शिवानी की इस दिनचर्या के चलते उसकी ऊंची उड़ान व उसके इसी जज्बे के साथ जिंदगी और ख्वाहिश में उसके बीच की जंग में केवल उसका हौसला ही दे रहा और शिवानी इसी हौसले के साथ लगातार एक के बाद एक नई इबादत कागज के पन्नों में दर्ज कराती हुई अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाती जा रही है.

जो अपने गरीब मजदूर मां और पिता के आशीर्वाद के दम पर वह खो-खो के अलावा कबड्डी में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी है और दो बार प्रदेशस्तर की प्रतियोगिता में अपने इस जज्बे को दिखा चुकी है. शिवानी के घर की दीवार पर टंगे इन पदकों के बीच एक जगह खाली है. दीवार पर यह खाली जगह उसको हर रोज याद कर उस राष्ट्रीय पदक को लगने का संकल्प लिए है जो उसे आगे बढ़ने को हर पल उसको प्रेरित करता है.

छोटी उम्र में अपने बड़े सपने को पूरा करने के लिए टप्पल ब्लाक के एक छोटे से गांव बीधा की गढ़ी की रहने वाली 13 वर्षिय किशोरी शिवानी ने पिछले करीब छह साल से अपनी दिनचर्या ही बदल दी है. शिवानी एक सरकारी स्कूल में कक्षा आठ की छात्र है. वो एक बेहद ही गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है. शिवानी के पिता राकेश कुमार हरियाणा के गुड़गांव के अंदर एक फैक्ट्री में मजदूरी करने का काम करते हैं, और मां मंजू देवी दूसरों के खेतों में मजदूरी कर बटाई पर काम कर अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण करती है. शिवानी की एक नौ वर्षीय छोटी बहन भूमि सरकारी स्कूल में कक्षा 6 की छात्रा और 11 वर्षीय छोटा भाई शेखर क्षेत्र के प्राइवेट स्कूल में कक्षा सात का छात्र है.

जब महंगाई की इस दौड़ में पढ़ाई और घर का खर्चा माता-पिता की मेहनत से होने वाली आय से पूरा न हो पाया तो तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी शिवानी ने भी हाथ में दरांती थाम ली. करीब तीन साल से वह भी मां के साथ खेतों मजदूरी कर रही हैं. शुरू से ही मां के साथ रहने के चलते वह दरांती चलाना सीख चुकी थी. अब फसल में पानी लगाने के साथ ही खेतों में फसलों की बोआई से लेकर खेत में खड़ी फसल के लहलाने के बाद पक चुकी उस फसल को काटते हुए उसके कई घंटे खेती में कैसे और कब बीत जाते खेतो में बिताए गए उन घंटो का शिवानी को पता ही नहीं चलता. लेकिन इस बीच खुद के बनाए टाइम टेबल को वह नहीं भूलती है. हर रोज सुबह चार बजे उठकर पहले पढ़ाई करती और फिर गांव में ही तीन से चार किलोमीटर दौड़ लगाती हैं. इसके बाद जट्टारी में कोच दलबीर सिंह बालियान के निर्देशन में प्रैक्टिस करती है.


मंजू देवी ने बताया कि उनकी बेटी शिवानी कक्षा 8 में पढ़ने के साथ कबड्डी भी खेलती है. अलीगढ़ के नुमाईश ग्राउंड में पिछले 5 साल से लगातार गोल्ड मेडल जीतने के साथ आगरा जोन सहित टप्पल ब्लॉक स्तर पर भी खेल चुकी है. उसके पति गुड़गांव में एक ओपो कंपनी में मजदूरी करने का काम करते है, और मंजू देवी एक आशा के तौर पर नोकरी करती है जिसके बदले 2200 रुपये मिलते है. साथ ही मंजू देवी ने बताया कि खेती से ही परिवार और बच्चों का खर्चा चलता और पालन पोषण होता है.

वहीं जट्टारी कस्बे में कब्बड्डी की एक छोटी एकेडमी चलाने वाले दलवीर सिंह बालियान कबड्डी के कोच है. जिन्होंने बताया कि खिलाड़ी शिवानी के अंदर एक बहुत ही बड़ी प्रतिभा छिपी हुई है जो लगातार 4 साल से अपनी टीम को अलीगढ़ नुमाईश ग्राउंड में प्रत्येक साल एक प्रतियोगिता होती है. जिसमें कबड्डी, खो-खो,एथलीट,और कुश्ती होती है. जिस प्रतियोगिता में खो-खो और कबड्डी में लगातार गोल्ड मैडल जीतते हुए आ रही है. जहा खिलाड़ी शिवानी लखनऊ स्टेट तक खेल चुकी है और अभी अंडर 14 खेल रही है.