पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो हई है. सोमवार को  मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी और दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी को चुनौती देते हुए ऐलान किया कि वह उनके गढ़ नंदीग्राम से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेंगी.

तो उसके तुरंत बाद ही बीजेपी नेता अधिकारी ने चुनौती स्वीकार करते हुए कहा कि वह चुनाव में उन्हें हरायेंगे, वरना राजनीति छोड़ देंगे. अधिकारी हाल ही में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गये थे. उन्होंने ट्वीट कर कहा, ”स्वागत है दीदी, 21 साल से आपके साथ खड़ा था. इस बार नंदीग्राम में आमने-सामने मुलाक़ात होगी. इंतज़ार रहेगा.”

बता दें कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जीं ने नंदीग्राम में एक रैली में कहा कि दूसरे दलों में जाने वालों को लेकर उन्हें कोई चिंता नहीं क्योंकि जब तृणमूल कांग्रेस बनी थी, तब उनमें से शायद ही कोई साथ था. उन्होंने कहा कि इन नेताओं ने पिछले कुछ सालों के दौरान ‘अपने द्वारा लुटे गये’ धन को बचाने के लिए पार्टी  छोड़ी है. साथ ही बनर्जी ने कहा, ‘‘ मैंने हमेशा से नंदीग्राम से विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत की है. यह मेरे लिए भाग्यशाली स्थान है. इस बार,मुझे लगा कि यहां से विधानसभा चुनाव लड़ना चाहिए. मैं प्रदेश पार्टी अध्यक्ष सुब्रत बख्शी से इस सीट से मेरा नाम मंजूर करने का अनुरोध करती हूं. वहीं मंच पर मौजूद बख्शी ने तुरंत अनुरोध स्वीकार कर लिया.

तो वहीं ममता के ऐलान के बाद  कोलकाता में रोड शो और जनसभा कर रहे अधिकारी ने कहा, यदि मुझे मेरी पार्टी (बीजेपी) नंदीग्राम से चुनाव मैदान में उतारती है तो मैं उनको कम से कम 50,000 वोटों के अंतर से हराऊंगा, अन्यथा मैं राजनीति छोड़ दूंगा.’’

हालांकि मुख्यमंत्री ने यह ङी कहा कि यदि संभव हुआ तो मैं भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों जगहों से चुनाव लडूंगी. नंदीग्राम मेरी बड़ी बहन है और भवानीपुर मेरी छोटी बहन. यदि मैं भवानीपुर से चुनाव नहीं लड़ पायी तो मैं वहां से कोई और मजबूत उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारूंगी.’’ उन्होंने कहा कि वह ‘कुछ लोगों ’ को बंगाल को कभी बीजेपी के हाथों नहीं बेचने देंगी. बता दें कि राज्य में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं.

बता दें कि नंदीग्राम विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण के लिए तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के ‘जबरन’ ‘जमीन अधिग्रहण के विरूद्ध विशाल जनांदोलन का केंद्र था. लंबे समय तक चले और रक्तरंजित रहे इस आंदोलन के चलते ही बनर्जी और उनकी पार्टी उभरी और 2011 में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में पहुंचीं. इसी के साथ 34 साल से जारी वाम शासन पर पूर्ण विराम लगा था.