अलीगढ़- एएमयू के सौ वर्ष पूरे होने पर पिछले 100 साल के इतिहास को एक टाइम कैप्सूल में रख केम्पस के अंदर ही दफ़न करने की तैयारी AMU प्रशासन द्वारा की जा रही है। जिस से आगे आने वाली पीढ़ी को विश्वविद्यालय के इतिहास को समझने में आसानी हो सके। एएमयू का इतिहास टाइम कैप्सूल में डिजीटल व प्रिंटिंग दोनों रूप में शामिल होगा ।  AMU केम्पस में टाइम कैप्सूल जमीन में दफनाने के लिए चार स्थान चिह्नित किए गए। टाइम कैप्सूल को इस प्रकार तैयार किया जायेगा जिससे कि वह जमीन के अंदर अगले सैकड़ों वर्षों तक विश्वविद्यालय से जुड़ी जानकारी को सुरक्षित रख सके। जो चार स्थान चिह्नित किए गए, उनमें ऐतिहासिक विक्टोरिया गेट, सर सैयद हाउस, मौलाना आजाद लाइब्रेरी और केनेडी हॉल परिसर शामिल हैं।साथ ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय 143 साल पहले दफन किये गये कैप्सूल को भी बाहर निकालने की तैयारी कर रहा है। जिस का मकसद विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष पर नई पीढ़ी को इतिहास से अवगत कराना है।

दरअसल एएमयू संस्थापक सर सैयद अहमद खां ने मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (एमएओ) की स्थापना के समय भी टाइम कैप्सूल जमीन में दफ़नाया था। बॉक्सनुमा कैप्सूल को  स्ट्रेची हॉल के पास जमीन में रखा गया था। यूनिवर्सिटी जमीन के उस नक्शे की तलाश में जुटी है, जहां कैप्सूल रखा गया था। कैप्सूल को जमीन में रखने की उस समय की तस्वीर इंतजामिया के पास है। कैप्सूल में मदरसा तुल उलूम से लेकर एमएओ कॉलेज की स्थापना तक के संघर्ष के दस्तावेज व अन्य सामान को रखा था। दिल्ली में जन्मे सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ में नौकरी की थी। पर्यावरण की दृष्टि से अलीगढ़ को बेहतर मानते हुए सर सैयद ने 24 मई 1875 को मदरसा तुल उलूम के रूप में यूनिवर्सिटी की नींव रखी थी। सात छात्रों से शुरू हुए मदरसे को बाद में वर्ष 1920 में विश्वविद्यालय का रूप दिया गया था। आठ जनवरी 1877 को मोहम्मद एंग्लो कॉलेज की स्थापना के समय  बड़ा  समारोह हुआ था। उद्घाटन वायसराय लार्ड लिटिन  ने किया। बनारस के नरेश शंभू नारायण भी शामिल हुए। करीब 140 वर्ष पहले भी सर सैयद ने वायसराय व नरेश की मौजूदगी में टाइम कैप्सूल जमीन में रखा था। इसका जिक्र अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट के 12 जनवरी 1877 को प्रकाशित अंक में मिलता है। कैप्सूल में सोने, चांदी व तांबे के सिक्कों के साथ मदरसा व कॉलेज की स्थापना के लिए किए संघर्ष आदि की दास्तां शामिल हैं। कैप्सूल में सामान को रखने के लिए कांच की बोतलों का इस्तेमाल किया गया था। वर्ष 1877 में दफन किये गये कैप्सूल को अब बाहर निकालने पर विश्वविद्यालय प्रशासन विचार कर रहा है। ताकि पुराने इतिहास को नई पीढ़ी जान सके। 

वहीं एएमयू उर्दू एकेडमी के डायरेक्टर एवं पीआरओ सैल के मेंबर इंचार्ज डॉ. राहत अबरार ने बताया कि विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में नया कैप्सूल दफन करने की तैयारी की जा रही है। ताकि 100 साल के इतिहास को संजोकर सुरक्षित रखा जा सके। जिसको सालों बाद नई पीढ़ी देख सके।  हमारे जो संस्थापक थे सर सय्यद अहमद खान उन्होंने भी 1877 में जब इस कॉलेज की आधारशिला रखी थी उस वक्त भी उन्होंने एक कैप्सूल जमीन में गाड़ा था। उसकी भी सारी सूचना हमारे पास मौजूद है। वो मिल गई है। जो सर सय्यद की लेगसी थी उसी की उसी को आगे बढ़ाना है और 100 साल बाद हम एक नया इतिहास है वह सुरक्षित रखने के लिए का प्रयास कर रहे हैं। 

तो वहीं राहत अबरार द्वारा जो 143 वर्ष पूर्व टाइम कैप्सूल दफ़न कर रखे जाने की बात कही जा रही है उस के बारे में कोई जानकारी होने से प्रसिद्द इतिहासकार  इरफ़ान हबीब इंकार कर रहे हैं।  इस से एक नया विवाद केम्पस में खड़ा हो गया है।  इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने बताया कि मुझे इसका कोई इल्म नहीं है। अगर यह कहा जाता है कि सर सैयद के जमाने में यह हुआ था तो वहां उस वक्त तो यह ख्याल ही नहीं था। मेरे तजुर्बे में तो कोई ऐसी बात नहीं हुई। उस जमाने में दफनाने की कोई बात ही नहीं थी। दफनाने का सिलसिला करीब 20-30 साल पहले से शुरू हुआ है कि दुनिया पर जो कोई कभी आफत आ जाए तो जो रिकॉर्ड है वह सुरक्षित रह सके। 

बता दें कि विवि की स्थापना के शताब्दी वर्ष को लेकर की जा रही तैयारियों के क्रम में विश्वविद्यालय में एक कमेटी का गठन किया गया है। जिसमें रजिस्ट्रार अब्दुल हमीद, इतिहास विभाग के प्रो. एमके पुंडीर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के चेयरमैन प्रो. मिर्जा फैसल बेग, यूनिवॢसटी इंजीनियर राजीव शर्मा, सर सैयद एकेडमी के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. मो. शाहिद बोस व उर्दू अकेडमी के डायरेक्टर डॉ. राहत अबरार शामिल हैं।