written by Suman Vashisht Bharadwaj

वो लड़की मेरे मन का उजला सा दर्पण लगती है
भीगती बारिश में जैसे छत पर कोई यौवन लगती है
सुनहरी सी धूप की वो पहली किरण लगती है
वीणा के तारों से टकराने वाली जैसे कोई धुन लगती है।

खाली दिल को भरने वाला वो अपनापन लगती है
मेरे एहसासों को वो सीता सी पावन लगती है
पैरों में बजती पायल की जैसे छनछन लगती है
हाथों में खनकता जैसे कोई सुंदर कंगन लगती है।

पूजा की थाली हाथों में लिए जैसे वो कोई जोगन लगती है
गंगा जमुना सरस्वती त्रिवेणी का वो संगम लगती है
माथे पर सुंदर बिंदिया उसके वो क्या किसी देवी से कम लगती है
वो लड़की मेरे मन का उजला सा दर्पण लगती है।