(Written by Suman Vashisht Bharadwaj)

उनको अपनी चाहतों का कुछ यूँ गुमाँ हो बैठा,
कुछ ख्वाहिशें क्या दे गए वो हमको,
उनका दिल उनके लिए जैसे खुदा हो बेठा।

जश्न ए इश्क वो मनाते रहे, आशिकी के गीत गाते रहे,
दिल हमारा टूटा वजह भी हम को ही बताते रहे।

महफिले वो सजाते रहे, चिराग वो जलाते रहे,
और दर्द की वजह भी हमको ही बताते रहे।

उनके इल्जामों से हम तो डूब गए गर्द ए दरिया में,
उनके इल्जामों से हम तो डूब गए गर्द ए दरिया में,
और वो देखो हमारा हस कर मजाक बनाते रहे।

क्या खूब मोहब्बत थी उनकी, क्या खूब मोहब्बत थी उनकी,
कि हमें दीवाना बना कर खुद को बेगाना बताते रहे

जब धड़कनें हमारी थमती रही, जब सांस हमारी सिसकती रही,
हम इस दुनिया से रुखसत होते रहे, वो देखो बेरहम होकर,
किसी और के नाम की मेहंदी हथेली पर रचाते रहे।

ना आये वो बेरहम जनाजे पर भी मेरे ,
ना आये वो बेरहम जनाजे पर भी मेरे,
हम उनका इंतजार कर अपनी कब्र सजाते रहे।

क्या खूब मोहब्बत थी उनकी,
क्या खूब मोहब्बत थी उनकी,
कि हर बार मेरी चाहत को यूँ ही आजमाते रहे,
हम दिल ही दिल सिसकते रहे,और वो मुस्कुराता रहे