• Wed. Sep 29th, 2021

महान शायर-निदा फ़ाज़ली एक नाम ही काफी है

महान शायर निदा फ़ाज़ली का जन्म दिल्ली में 12 अक्टूबर 1938 को एक कश्मीरी परिवार में हुआ था. और इस मसहूर शायर का निधन 8 फरवरी 2016 को मुम्बई में हुआ. निदा फाजली ने सरल शब्दों से मोहब्बत और अमन-चैन को बहुत ही शिद्दत से सबके सामने रखा. निदा फाजली हिंदी उर्दू की अदबी दुनिया के सितारे थे. उन्होंने बेशक तमाम फिल्मों में गाने लिखे पर उनकी शायरी इससे मटमैली नहीं हुई. उसमें इंसानियत की खुशबू दिनोदिन परवान चढ़ती रही. उनके लफजों में ऐसा मीठापन था कि सुनने वाला इसकी धुन में खो जाए. वे एक तजुर्बेकार इंसान थे. बहुत हिसाबी किताबी वे न थे इसलिए वे किताबी दुनिया से बाहर आने का आहवान करते थे और अपना पैगाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे के फलसफे में यकीन करते हुए इस बात के हामी थे कि इंसान को खुद आगे बढ़ कर हाथ मिलाने को तैयार रहना चाहिए.

धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो |
सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती
दिल की धड़कन को भी बीनाई बनाकर देखो |
पत्थरों में भी ज़बाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरो-दीवार सजाकर देखो |
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो |
फ़ासला नज़रों का धोका भी तो हो सकता है
चाँद जब चमके तो ज़रा हाथ बढाकर देखो |

12 अक्तूबर 1938 को जन्मे निदा फ़ाज़ली बचपन के दिनो में अपने मशहूर शायर पिता मुर्तुज़ा हसन, माँ जमील फ़ातिमा और भाई के साथ दिल्ली में रहते थे. निदा फ़ाज़ली तो उनका शायरी का नाम है. निदा मायने स्वर, आवाज़ और फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है, जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ लिया था। बाद में यह परिवार ग्वालियर (म.प्र.) में जाकर बस गया. निदा की पढ़ाई-लिखाई वहीं के कॉलेज में हुई. उन दिनो उनके पिता और बड़े भाई हिंदुस्तानी शायरी की दुनिया में खूब नाम कमा रहे थे. हिन्दू-मुस्लिम क़ौमी दंगों से तंग आ कर एक दिन वे अचानक पाकिस्तान चले गए. वहीं बस गए. जाते समय वह निदा को भी साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उन्हें अपने वतन से बेइंतहा प्यार है, वह इसे छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाएंगे, और वह नहीं गए, हमेशा के लिए हिंदुस्तान का ही होकर रह गए.

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए
जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए
ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जा

निदा फ़ाज़ली की शायरी के सफर की शुरुआत बड़ी ही दर्द नाक थी. जब वह कॉलेज में पढ़ते थे, उनके आगे की बेंच पर रोजाना एक लड़की बैठा करती थी. आहिस्ता-आहिस्ता उसके लिए उनके दिल में कुछ सुगबुगी होने लगी थी. वह उससे दिली लगाव महसूस करने लगे थे पर एक दिन नोटिस बोर्ड पर पढ़ने को मिला, मिस टंडन की एक एक्सीडेंट में मौत हो गई है. उस दिन निदा का दिल रो उठा था. उसकी यादों के लफ्जों ने उनके दिल को जकड़ सा लिया. वह कई दिन तक अकेले में सिसकते थे. उन्हीं दिनो शायरी ने आहिस्ते से उनकी कलम को छुआ,

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता।
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता।
सब कुछ तो है क्या ढूँढ़ती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता।
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता।
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता।
वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता।

निदा फ़ाज़ली एक कमाल के शायर और कवि थे, वो जो भी कहते या लिखते थे वो आज भी दूर तक दिल को छू कर जाता है

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब-ए-रवाँ से सुनिए
चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए

चाहे परिवार के पाकिस्तान जाने का वक्त रहा हो या हिंदुस्तान में रोजी रोटी के लिए ठोकरें खाने का समय हो, उन्होंने अपनी निर्मलता नहीं खौई

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं।
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।
जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं।
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं।
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं।

AAJ KEE KHABAR PURANI YAADEN

Latest news in politics, entertainment, bollywood, business sports and all types Memories .