Written by Suman Vashisht Bharadwaj
ए ग़ालिब सुन मोहब्बत का ये फ़साना
मैं दूर तक उसकी आंखों का अफसाना बना दूंगा
ए ग़ालिब सुन मोहब्बत का ये फ़साना
मैं दूर तक उसकी आंखों का अफसाना बना दूंगा
दिवाना हूँ मैं उसका, उसे भी मैं एक दिन अपना दिवाना बना दूंगा।
ए ग़ालिब अभी तक देखे थे जो ख़्वाब मेरी आँखों ने
ए ग़ालिब अभी तक देखे थे जो ख़्वाब मेरी आँखों ने
वो ख़्वाब मैं एक दिन उसकी आँखों तक भी पहुंचा दूंगा
दिवाना हूँ मैं उसका, उसे भी मैं एक दिन अपना दिवाना बना दूंगा।
ए ग़ालिब महफूज़ रखूंगा मैं उम्र भर उसे अपने दिल में
ए ग़ालिब महफूज़ रखूंगा मैं उम्र भर उसे अपने दिल में
एक दिन मैं खुद को भी उसके दिल तक पहुंचा दूंगा
दिवाना हूँ मैं उसका, उसे भी मैं एक दिन अपना दिवाना बना दूंगा।
ए ग़ालिब मेरी हर शाम ए महफिल रौशन होती है उसकी यादों से
ए ग़ालिब मेरी हर शाम ए महफिल रौशन होती है उसकी यादों से
मैं एक दिन खुद को भी उसकी शामों तक पहुंचा दूंगा
दिवाना हूँ मैं उसका, उसे भी मैं एक दिन अपना दिवाना बना दूंगा।
ए ग़ालिब ना देखे अभी वो मुझको पलट कर
ए ग़ालिब ना देखे अभी वो मुझको पलट कर
एक दिन मैं उसको पलट कर देखना सिखला दूंगा
दिवाना हूँ मैं उसका, उसे भी मैं एक दिन अपना दिवाना बना दूंगा।

ए ग़ालिब मोहब्बत का ये तराना मैं एक दिन
किताबों मैं भी छपवा दूंगा
दिवाना हूँ मैं उसका, उसे भी मैं एक दिन अपना दिवाना बना दूंगा।