Written by Suman Vashisht Bharadwaj

मैं देश की अधूरी सी कहानी का एक किरदार हूं। मैं देश में बिखरा हुआ बस एक प्रचार हूंं।
हालांकि मैं लोकतंत्र का अटूट आधार हूं।
मैं जनता के अधिकारों की धार हूं।
पर आजकल मैं बस राजनेताओं की राजनीति का एक उपहार हूं।
अब तो लगता है मैं बस वोटों के लिए बटती हुई शराब का इंतजार हूं।
लगता है अब तो बस मैंं  प्रचार के लिए खरीदी गई कोई कार हूं।
अब तो महसूस होता है जैसे मैं दीवारों पर चिपके हुए पोस्टरों का बस  इश्तिहार हूं।
हां मैं लोकतंत्र का अटूट आधार हूं।
पर आजकल मैं भी इतना लाचार हूं।
कि भ्रष्ट दलबदल की राजनीति में घिरा हुआ बस एक हाहाकार हूं।
हां मैं ही हूं आकर जाने वाले 5 साल का इंतजार, माना की मैं ही हूं देश की जनता का एक
अधिकार ,
पर अब मैं रह गया हूं, बस लुटेरों के थैले का बाजार।
जी हां, मैं ही हूं जिसे सब कहते हैं चुनाव।
हां मैं ही हूं नेताओं का वर्तमान और जनता का भविष्य।
जो 5 साल में एक बार आता है फिर अंधेरों में डूब जाता है।
जो नेताओं की लाल बत्ती जला जाता है।
और जनता की बत्ती बुझा जाता है।
जो भ्रष्ट नेताओं का परचम लहरा जाता है।
जो फिर से अंधेरों में देश को 5 साल के लिए डूबा जाता है।
मैं वही चुनाव हूं जो हर 5 साल में एक बार जरूर आता है।
फिर भी मैं लोकतंत्र का आटूट आधार हूँ।
मैं जनता के अधिकारों की धार हूं।
पर आजकल मेरा सरोकार बस नेताओं से ही  है
क्योंकि देश की जनता तो वोट देने के बाद भी लाचार है।
हां भाई क्योंकि आजकल चुनाव बीमार है बीमार है बीमार है