मध्यप्रदेश में 15 साल बाद सत्ता वनवास खत्म कर वापसी करने वाली कांग्रेस की कमान अब कमलनाथ के हाथ में हैं. दो दिन की कवायत के बाद राहुल गांधीन ने मध्यप्रदेश के सीएम के लिए कमलनाथ का नाम घोषित किया. कमलनाथ कांग्रेस के एक दिग्गज नेता मने जाते हैं. इतना ही नहीं कमलनाथ को देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपना तीसरा बेटा मानती थीं.

बता दें कि 11 दिसंबर को आए विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद से कांग्रेस में सीएम पद को लेकर माथापच्ची चल रही थी. मुख्यमंत्री पद के लिए कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम की सबसे ज्यादा चर्चा थी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तरफ से कमलनाथ के नाम पर मुहर लगी.

page-34.jpg

कमलनाथ का अबतक का सफर

कमलनाथ कांग्रेस के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जिन्होंने पार्टी का साथ कभी नहीं छोड़ा. राजिव गांधी के निधन से लेकर कांग्रेस के हर मुश्किल समय में कमलनाथ ने कांग्रेस के साथ खड़े रहे. जब शरद पवार जैसे दिग्गज नेता भी कांग्रेस से दूर हो रहे थे उस समय भी कांग्रेस के प्रति अपने कर्तव्यों और निष्ठा से वो कांग्रेस के साथ  ही जमकर खड़े रहे. साल 2018 अप्रैल में उन्हें मध्य प्रदेश में कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.

कमलनाथ की गिनती देश के दिग्गज राजनेताओं में होती है. मध्य प्रदेश ने देश को जितने भी नामी राजनेता दिए हैं उनमें से एक कमलनाथ भी हैं.  18 नवंबर 1946 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में जन्मे कमलनाथ की स्कूली पढ़ाई मशहूर दून स्कूल से हुई. दून स्कूल में उनकी जान पहचान कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे संजय गांधी से हुई. दून स्कूल से पढ़ाई करने के बाद कमलनाथ ने कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से बी.कॉम में स्नातक किया. 27 जनवरी 1973 को कमलनाथ अलका नाथ के साथ शादी के बंधन में बंधे. कमलनाथ के दो बेटे हैं. उनका बड़ा बेटा नकुलनाथ राजनीति में सक्रिय है.

इंदिरा गांधी

34 साल की उम्र में जीता पहला चुनाव

कमलनाथ 9 बार लोकसभा के लिए चुने जा चुके हैं. वह साल 1980 में 34 साल की उम्र में छिंदवाड़ा से पहली बार चुनाव जीते जो अब तक जारी है. कमलनाथ 1985, 1989, 1991 में लगातार चुनाव जीते. 1991 से 1995 तक उन्होंने नरसिम्हा राव सरकार में पर्यावरण मंत्रालय संभाला. वहीं 1995 से 1996 तक वे कपड़ा  मंत्री रहे.

1998 और 1999 के चुनाव में भी कमलनाथ को जीत मिली. लगातार जीत हासिल करने से कमलनाथ का कांग्रेस में कद बढ़ता गया और 2001 में उन्हें महासचिव बनाया गया. वह 2004 तक पार्टी के महासचिव रहे. छिंदवाड़ा में तो जीत का दूसरा नाम कमलनाथ हो गए और 2004 में उन्होंने एक बार फिर जीत हासिल की. यह लगातार उनकी 7वीं जीत थी. गांधी परिवार का सबसे करीबी होने का इनाम भी उनको मिलता रहा और इस बार मनमोहन सिंह की सरकार में वे फिर मंत्री बने और इस बार उन्हें वाणिज्य मंत्रालय मिला.

उन्होंने यूपीए-1 की सरकार में पूरे 5 साल तक यह अहम मंत्रालय संभाला. इसके बाद 2009 में चुनाव हुआ और एक बार फिर कांग्रेस का यह दिग्गज नेता लोकसभा के लिए चुना गया. छिंदवाड़ा में कांग्रेस का यह ‘कमल’ लगातार खिलता गया और इस बार की मनमोहन सिंह की सरकार में इनको सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय मिला. साल 2012 में कमलनाथ संसदीय कार्यमंत्री बने.

मध्य प्रदेश में मिली थी अहम जिम्मेदारी

कानपुर में जन्मे, देहरादून और पश्चिम बंगाल में पढ़ाई की लेकिन ऐसा क्या हुआ कि कमलनाथ को राजनीति मध्य प्रदेश से करनी पड़ी. दरअसल देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार से आने वाले संजय गांधी की दोस्ती दून स्कूल में पश्चिम बंगाल से आने वाले कमलनाथ से हुई. दून स्कूल से शुरू हुई ये दोस्ती धीरे-धीरे पारिवारिक होती गई. दून स्कूल से पढ़ाई करने के बाद कमलनाथ कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज पहुंचे. हालांकि शहर तो बदल गया लेकिन दोनों दोस्ती ज्यादा दिन दूर नहीं रह पाए

कमलनाथ पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के दौर से ही गांधी परिवार के करीबी रहे हैं. कमलनाथ अपना बिजनेस बढ़ाना चाहते थे. ऐसे में एक बार फिर दून स्कूल के ये दोनों दोस्त फिर करीब आ गए. कहा जाता है इमरजेंसी के दौर में कमलनाथ की कंपनी जब संकट में चल रही थी तो उसको इससे निकालने में संजय गांधी का अहम रोल रहा.

संजय गांधी की छवि एक तेज तर्रार नेता के तौर पर होती थी. कमलनाथ इंदिरा गांधी के इस छोटे बेटे के साथ हर वक्त रहते थे. बड़े बेटे राजीव गांधी को राजनीति में आने की इच्छा नहीं थी. ऐसे में संजय गांधी को जरूरत थी एक साथ की और वे थे कमलनाथ. 1975 में इमरजेंसी के बाद से कांग्रेस  खराब दौर से गुजर रही थी. इस दौर में संजय गांधी की असमय मौत हो गई थी, इंदिरा गांधी की भी उम्र अब  साथ नहीं दे रही थी. कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई. कमलनाथ गांधी परिवार के करीब आ ही चुके थे, वे लगातार मेहनत भी कर रहे थे.

वह लगातार पार्टी के साथ खड़े हुए थे. इसका इनाम उन्हें इंदिरा गांधी ने दिया जब उन्हें छिंदवाड़ा सीट से टिकट दिया और राजनीति में उतार दिया. बस फिर क्या इसके बाद छिंदवाड़ा कमलनाथ का हो गया और कमलनाथ छिंदवाड़ा के. वे तब से लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे हैं. सिर्फ एक बार उनको इस सीट पर हार मिली है. यह इलाका कमलनाथ का गढ़ बन चुका है.