बुलंदशहर हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की शहादत के बाद जो दर्द पूरे देश के सामने उभर कर आया वो तो हम सबने  देख, पर इस हिंसा में एक शख्स और भी मार गया, जिसे अब इस हिंसा का हिस्सा बताया जा रहा है, अगर आज वो जिन्दा होता, तो बता पाता कि वाकई वो इस भीड़ का हिस्सा था या नहीं.

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जी हाँ भविष्य में पुलिसकर्मी बनने का सपना देख रहा सुमित 20 दिन पहले ही खेतीबाड़ी में अपने पिता की मदद करने के लिए बुलंदशहर आया था, लेकिन यहां पर भीड़ द्वारा की गई हिंसा में वह फंस गया और उसकी जान चली गई. सुमित के रिश्ते के एक भाई ने बताया कि  20 वर्षीय सुमित पुलिस बनने की राह पर अग्रसर था और वह इसके लिए घर से दूर एक कोचिंग क्लास भी करता था और प्रशिक्षण भी ले रहा था. गौरतलब है कि सोमवार को बुलंदशहर के स्याना में गोकशी की अफवाह के बाद फैली हिंसा के दौरान गोली लगने से सुमित की मौत हो गई थी. मंगलवार को सुमित के अंतिम संस्कार से पहले उसके शव को पकड़कर रोती उसकी मां कह रही थी, ‘वह पुलिस अधिकारी बनता. इस मां का दर्द भी कुछ कम तो नहीं होगा, जिसका बेटा आंखों में एक सपना लिए बिना वजह ही एक हिंसा का शिकार हो गया.

ये था सुमित की आखों का सपना, सुमित के भाई अनुज कुमार ने बताया कि 12वीं के बाद उसने बीकॉम की पढ़ाई शुरू की थी लेकिन एक साल बाद उसने इसे छोड़ दिया. इसके बाद वह बीए (प्राइवेट) करने लगा और बुलंदशहर में लाखोटी के एक कॉलेज से दो साल की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी. साथ ही कुमार ने बताया कि ‘वह दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस में आवेदन करता था. वह पुलिस विभाग में भर्ती होने को लेकर आश्वस्त था और हर सुबह दौड़ने के लिए जाता था. उसने कुछ समय के लिए जिम भी जॉइन किया था. सोमवार को हिंसा के दिन सुमित का एक दोस्त निकट के गांव बरौली से अपनी शादी का कार्ड देने आया था और जाते हुए उसने सुमित को बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए कहा. यह बस स्टैंड चिंगरावती गांव के निकट मुख्य सड़क पर है.

वह लोग जब चिंगरावती पुलिस चौकी के निकट थे तो वहां हिंसा भड़क उठी, यह स्थान पुलिस थाने के पास है लेकिन सुमित को इस हिंसा की भयावहता के बारे में पता नहीं था. अनुज ने कहा, ‘यह दो घंटे तक चलता रहा और उसने सोचा कि यह खत्म हो जाएगा. छोटी लड़ाइयां प्राय: होती रहती है और लोग पुलिस चौकी के बाहर जुटते हैं लेकिन कुछ ऐसा हो जाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं थी.

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अगर मान ले कि सुमित इस हिंसा का हिस्सा था, तो उसको इस हिंसा का हिस्सा बनने के लिए मजबूर करने वाले वो कौन लोग थे, हमारे देश का सिस्टम ने, या देश में बढ़ते भेदभाव ने, या धर्म की राजनीति करने वाले राजनेताओं ने, जी हां ना सिर्फ सुमित बल्कि सुमित जैसे ना जाने कितने ही नौजवान ऐसी ही भीड़ का शिकार बनके अपनी जान गवा देते है, आखिर क्या कसूर था, उस 20 साल के लड़के का जो कुछ ख्वाब दिल में लिए यह दुनिया छोड़ गया, और अपने पीछे कई ऐसे सवाल जिस पर हमें अब सोचना होगा.